राजस्थान का एकीकरण भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय वर्तमान राजस्थान का क्षेत्र अनेक छोटी-बड़ी रियासतों में बँटा हुआ था। इन रियासतों को मिलाकर एक संगठित राज्य बनाने की प्रक्रिया को राजस्थान का एकीकरण कहा जाता है।
यह प्रक्रिया 18 मार्च 1948 से शुरू होकर 1 नवंबर 1956 को पूर्ण हुई। इस दौरान कुल 7 चरणों में राजस्थान का वर्तमान स्वरूप विकसित हुआ।
1. स्वतंत्रता से पहले राजस्थान की स्थिति
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। उस समय आज के राजस्थान के क्षेत्र में अनेक रियासतें थीं, जिन पर अलग-अलग राजा और महाराजा शासन करते थे।
प्रमुख रियासतें थीं:
जयपुर
जोधपुर
उदयपुर (मेवाड़)
बीकानेर
एकीकरण की आवश्यकता क्यों पड़ी?
छोटी-छोटी रियासतों के स्थान पर एक मजबूत राज्य बनाना।
प्रशासनिक व्यवस्था को सरल बनाना।
आर्थिक विकास और व्यापार को बढ़ावा देना।
जनता को लोकतांत्रिक शासन प्रदान करना।
राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा को मजबूत करना।
परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सिंचाई का विकास करना।
इस प्रक्रिया में सरदार वल्लभभाई पटेल और वी. पी. मेनन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। राजस्थान की रियासतों के एकीकरण में स्थानीय शासकों, प्रजामंडल आंदोलनों तथा अन्य नेताओं का भी योगदान था।
2. राजस्थान के एकीकरण के सात चरण एकीकरण की समयरेखा
1948 से 1956 तक की प्रमुख घटनाएँ
17/18 मार्च 1948 — मत्स्य संघ
अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली।
25 मार्च 1948 — राजस्थान संघ
नौ रियासतों का संघ; राजधानी कोटा।
18 अप्रैल 1948 — संयुक्त राजस्थान
राजस्थान संघ में उदयपुर का विलय।
30 मार्च 1949 — वृहद राजस्थान
जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर का विलय।
15 मई 1949 — संयुक्त वृहद राजस्थान
मत्स्य संघ का वृहद राजस्थान में विलय।
26 जनवरी 1950 — राजस्थान
सिरोही रियासत का अधिकांश भाग शामिल।
1 नवंबर 1956 — पुनर्गठित राजस्थान
अजमेर, आबू-देलवाड़ा और सुनेल-टप्पा जैसे क्षेत्रों के समायोजन से वर्तमान राज्य का स्वरूप पूरा हुआ |

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